भवानी मल खटीक
भगत सिंह से पूर्व तथा उनकी शहादत के पश्चात् भी अनेक क्रांतिकारियों ने अपने प्राणों की आहुति भारत माता के चरणों में दी हैं, परन्तु जितनी लोकप्रियता और रोमांच भगत सिंह के नाम के साथ जुड़ा है, वो भारत या विश्व के क्रांतिकारी इतिहास में दुर्लभ है। इसी वजह से उन्हें ‘शहीद-ए-आज़म‘ कहा जाता है। कांग्रेस के आधिकारिक इतिहासकार ‘पट्टाभि सीतारमैया‘ के अनुसार ‘यह कहना अतिशयोक्ति नही होगी कि सन् 1930 के दशक के प्रारंभिक वर्षों में भगत सिंह, महात्मा गाँधी के बराबर लोकप्रिय थे।‘ सुभाषचंद्र बोस, “भगत सिंह को व्यक्ति नही बल्कि क्रांति के प्रतीक की संज्ञा देते हैं।“ ब्रिटिश सरकार ने उन्हें आतंकवादी घोषित किया था, परन्तु वो खुद व्यक्तिगत तौर पर आतंकवाद के आलोचक थे। उन्होंने नवयुवक राजनीतिक कार्यकर्ताओं को लिखे पत्र में कहा था कि “ऊपरी तौर पर मैंने एक आतंकवादी की तरह काम किया है लेकिन मैं आतंकवादी नहीं हूँ। मैं क्रांतिकारी हूँ, जिसके दीर्घकालीन कार्यक्रम संबंधी ठोस व विशिष्ट विचार हैं। क्रांतिकारी जीवन के शुरू के चंद दिनों के सिवाय ना तो मैं आतंकवादी हूँ और ना ही था और मुझे पूरा यकीन है की इस तरह के तरीकों से हम कुछ भी हासिल नही कर सकते।“ भगत सिंह ने भारत में क्रांतिकारी आंदोलन को समाजवादी विचारधारा के साथ जोड़ा और अपने क्रांतिकारी संगठन का नाम “हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन“ (एच.एस.आर.ए.) रखकर समाजवादी व्यवस्था को अपना लक्ष्य घोषित किया।
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