प्रवीण यादव
सेवा केन्द्र स्थानीय महत्व के ऐसे क्षेत्र होते हैं जो अपने आस-पास रहने वाले लोगों को वस्तुएँ एवं सुविधाएँ उपलब्ध करवाते हैं। ये सेवा केन्द्र एक दूसरे से परिवहन मार्गों के माध्यम से जुड़े रहते हैं। यदि इन सेवा केन्द्रों का विकास ग्रामीण क्षेत्रों में होता है तो इन्हें ग्रामीण सेवा केन्द्र कहते हैं।
प्रभाव क्षेत्र किसी भी सेवा केन्द्र के चारों ओर फैला हुआ ऐसा क्षेत्र होता है जो उससे भली प्रकार से यातायात के साधनों से जुड़ा रहता है और उसकी केन्द्रीय सेवाओं से लाभान्वित होता रहता है। यह प्रभाव क्षेत्र समान स्तर के दूसरे सेवा केन्द्रों की तुलना में उस सेवा केन्द्र से कार्यात्मक रूप से अधिक सम्बद्ध रहता है। इस प्रभाव क्षेत्र से ही सेवा केन्द्र को कच्चा माल एवं खाद्य पदार्थों की आपूर्ति होती है तथा इस प्रभाव क्षेत्र में ही सेवा केन्द्र केन्द्रीय सेवाओं एवं उत्पादित वस्तुओं को भेजता है। सेवा केन्द्रों का प्रभाव क्षेत्र एक कार्यात्मक प्रदेश है, जिसमें सेवा केन्द्रों तथा इसके प्रभाव क्षेत्रों के बीच वस्तुओं एवं सेवाओं का आदान-प्रदान होता रहता है। प्रभाव क्षेत्रों को पृष्ठ प्रदेश, बाजार क्षेत्र, सेवा क्षेत्र, व्यापार क्षेत्र, पूरक क्षेत्र आदि नामों से भी जाना जाता है।
प्रभाव क्षेत्रों की सीमाओं को भौतिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक कारक प्रभावित करते हैं। आज के आधुनिक युग में विकसित परिवहन व संचार के साधनों के कारण भी सेवा केन्द्रों के प्रभाव क्षेत्रों का विस्तार हुआ है। प्रभाव क्षेत्रों के सीमांकन के अलग-अलग मापदण्ड हैं, जिनके आधार पर इनकी सीमाओं का विस्तार भिन्न-भिन्न हो सकता है। सेवा केन्द्रों के प्रभाव क्षेत्रों का सीमांकन करने के लिए अनेक विधियों का उपयोग किया जाता है।
प्रस्तुत शोध पत्र में शोधार्थी ने टोंक जिले के ग्रामीण सेवा केन्द्रों के प्रभाव क्षेत्रों का अध्ययन करने के लिए पी. डी. कनवर्स के अलगाव बिन्दु सिद्धान्त (Breaking Point Theory) का उपयोग किया है। पी. डी. कनवर्स ने इस मॉडल का प्रतिपादन 1949 में किया था।9 जिसमें निम्नलिखित सूत्र का प्रयोग किया गया था:
यहाँ B = दो सेवा केन्द्रों A तथा B के बीच का अलगाव बिन्दु (Breaking Point) B से,
PA तथा PB = दोनों केन्द्रों A एवं B की जनसंख्या
d = दोनों केन्द्रों के बीच की दूरी।
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