ब्रजेन्द्र सिंह
साहित्य एवं समाज दोनों एक दूसरे के अभिन्न अंग हैं। किन्तु यदि समाज में समता, समानता एवं अधिकार तथा शोषित, वंचित समाज को न्याय दिलाने की बात की जाए तो वहीं पर राजनीति का प्रवेश हो जाता है। राजनीति ने साहित्य को नई दशा एवं दिशा प्रदान की है। नब्बे के दशक में सम्पूर्ण विश्व में अनेक सकारात्मक एवं नकारात्मक परिवर्तन हुए। भारतीय समाज एवं साहित्य भी इससे अछूता न रहा। इसी समय भारत में कम्प्यूटर ने प्रवेश किया और इन्टरनेट से समाज का एक बड़ा तबका प्रभावित हुआ। देखा जाए तो उत्तर भारत में विशेष रूप से इस दौरान राजनैतिक, सामाजिक एवं धार्मिक भूचाल आया। मण्डल कमीशन द्वारा अन्य पिछड़े वर्गो को 7 अगस्त 1990 को आरक्षण देना, 24 जुलाई को 1991 को उदारीकरण की नीति का लागू होना, 6 दिसम्बर 1992 को बाबरी मस्जिद को गिराया जाना और नब्बे के दशक मे ही वैश्विक स्तर पर भूमण्डलीकरण, सोवियत संघ का विघटन आदि घटनाओं ने उत्तर भारत के राजनीति एवं समाज को ब्यापक स्तर पर प्रभावित किया। खासकर हिन्दी पट्टी के नाम से जाने-पहचाने जाने वाले क्षेत्र का कोई भी व्यक्ति बिना प्रभावित हुए नहीं रह पाया। इस आग की आंच ने सबको झुलसाया। इस आंच से तप कर सबने अपना-अपना आक्रोश व्यक्त किया। चाहे वह राजनेता, सामाजिक कार्यकर्ता हो कवि या आम आदमी।
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