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International Journal of Humanities and Arts
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Vol. 7, Issue 2, Part G (2025)

मृणाल पांडे का उपन्यास “रास्तों पर भटकते हुए“: एक समीक्षा

Author(s):

अभिजीत कुमार सिंह

Abstract:

आज महानगरीय जीवन मूल्यहीनता का जड बनता जा रहा है। यहां न किसी को किसी के भावनाओं की कदर है और न भावनाओं का एहसास है। बस आलिशान जीवन जीने के लिए इन्सान पैसों के पीछे भाग रहा है। गांव में रहनेवाला व्यक्ति भी यहां आकर अपनी संस्कृति भूल जाता है। एक तो आर्थिक विषमता के कारण महानगर अमीरी और गरीबी के बीच बटकर रह गया है। जिसके चलते महानगर में अमीरों की जीवनशैली और गरीबों की जीवन शैली में काफी अन्तर आ गया है। परंतु मृणाल पांडे जी ने अपने उपन्यासों विशेषत गरीबी से अमीर बने व्यक्ति के मूल्यों में किसतरह बदलाव होता है इसपर प्रकाश डाला है और महानगरीय जीवन में बढती मूल्यहीनता पर अपने विचार प्रस्तुत किए हैं। गांव से आया व्यक्ति महानगर में आने के बाद जब बडा बन जाता है तब उसे अपने रिश्ते पिछडे लगने लगते द्य केवल रिश्ते ही नहीं तो अपनी मातृभाषा भी उसे पिछडी लगती है। कारण वह पाश्चात्य संस्कृति के रंग में रंग जाता है। महानगरीय जीवन में बढती इस मूल्यहीनता पर मृणाल पांडे जी ने ‘रास्तों पर भटकते हुए इस उपन्यास में यथार्थ रूप में चित्रण किया है।

Pages: 576-579  |  71 Views  30 Downloads


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How to cite this article:
अभिजीत कुमार सिंह. मृणाल पांडे का उपन्यास “रास्तों पर भटकते हुए“: एक समीक्षा. Int. J. Humanit. Arts 2025;7(2):576-579. DOI: 10.33545/26647699.2025.v7.i2g.261
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